UPDATE CHANDAULI NEWS: चंदौली स्थित अज़ाखाना-ए-रज़ा का मुहर्रम दिलों को जोड़ने की दुआ के साथ संपन्न हुआ। बिछियां करबला में सुपुर्द-ए-खाक हुए अज़ाखाना-ए-रज़ा के फूल।
इंसानियत, भाईचारे और हक़ की राह पर चलने के पैगाम के साथ अज़ाखाना-ए-रज़ा का दस दिवसीय मुहर्रम शुक्रवार को ग़मगीन माहौल में संपन्न हो गया। सुबह सिकंदरपुर की अंजुमन अब्बासिया तथा स्थानीय अज़ादारों की मौजूदगी में अलम, ताबूत और अज़ाखाना-ए-रज़ा के फूलों का जुलूस निकाला गया। जुलूस चंदौली बाजार और डीएम कार्यालय के सामने से गुजरते हुए बिछियां करबला पहुंचा, जहां परंपरानुसार फूलों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
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मुहर्रम ग़मगीन माहौल में संपन्न
पूरे रास्ते अज़ादार "या हुसैन", "या अब्बास" और "अलविदा या हुसैन" की सदाओं के साथ मातम करते रहे। करबला पहुंचने पर वातावरण पूरी तरह ग़मगीन हो गया। नम आंखों से लोगों ने इमाम हुसैन और उनके वफ़ादार साथियों की शहादत को याद करते हुए उन्हें अंतिम सलाम पेश किया और इस बात का संकल्प लिया कि वे केवल मुहर्रम के दिनों में ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष इमाम हुसैन की शिक्षाओं—सत्य, न्याय, इंसानियत, सब्र और कुर्बानी—को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे।
मुहर्रम की अहमियत पर कलाम
इस अवसर पर मशहूर शायर वकार सुल्तानपुरी ने मुहर्रम की अहमियत पर कलाम पेश करते हुए कहा कि इमाम हुसैन किसी एक समुदाय के नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के रहबर हैं। उन्होंने कहा कि करबला का पैगाम हमें बताता है कि अन्याय और ज़ुल्म के सामने कभी सिर नहीं झुकाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर समाज में अमन, भाईचारा और मोहब्बत कायम रखनी है तो इमाम हुसैन की शिक्षाओं को अपने व्यवहार और जीवन का हिस्सा बनाना होगा।
इमामे हुसैन को खिराजे-अकीदत पेश
जुलूस में बड़ी संख्या में अज़ादारों ने शिरकत की और मातम के जरिए इमामे हुसैन को खिराजे-अकीदत पेश की। करबला में फूलों के दफ्न होने के साथ ही अज़ाखाना-ए-रज़ा का मुहर्रम संपन्न हो गया, लेकिन लोगों के दिलों में करबला की यादें और इमाम हुसैन की कुर्बानी का संदेश हमेशा की तरह ज़िंदा रहा।इस अवसर पर हसन इमाम, मोहम्मद रज़ा, अली, जैगम इमाम, अली इमाम, डॉ. गज़नफ़र इमाम, शाहिद बनारसी सहित बड़ी संख्या में अज़ादार और क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।





